पंखुरी के ब्लॉग पे आपका स्वागत है..

जिंदगी का हर दिन ईश्वर की डायरी का एक पन्ना है..तरह-तरह के रंग बिखरते हैं इसपे..कभी लाल..पीले..हरे तो कभी काले सफ़ेद...और हर रंग से बन जाती है कविता..कभी खुशियों से झिलमिलाती है कविता ..कभी उमंगो से लहलहाती है..तो कभी उदासी और खालीपन के सारे किस्से बयां कर देती है कविता.. ..हाँ कविता.--मेरे एहसास और जज्बात की कहानी..तो मेरी जिंदगी के हर रंग से रूबरू होने के लिए पढ़ लीजिये ये पंखुरी की "ओस की बूँद"

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Sunday, 5 October 2014

धधकती आग


















एक आग धधकती सीने में

क्या इसका मै उपचार करूँ


दर्द की हवाओ से सुलगाऊं


यू ही खुद पे अत्याचार करूँ



या करूँ अब इसका आमना सामना


तन मन में हिम्मत उपजाऊं


शोले छूने से डर जाऊं


या इस आग से अब साक्षात्कार करूँ



इस आग को अपनी शक्ति बना लूँ


इसकी लपटों से जल जाऊ


जलने दू इसको सीने में


या नयन बूँद से इसका संहार करूँ


खो जाऊं अंधेरो की गहराई में


जीवन में पल पल डरती जाऊं


या इस आग से भर लू रोम रोम को


प्रहलाद बनने को मन तैयार करूँ



 -----पारुल'पंखुरी'

चित्र-- साभार गूगल (www.fark.com

Wednesday, 1 October 2014

कैदी मन






















तन पिंजड़ा मन कैदी उड़ने को मेरा जी चाहे
बंधी हुई मैं  जंजीरों से मन तोड़ तोड़ उनको हारे
कुछ ख्वाब टूटे कुछ ख्वाइशें अधूरी
उस पर कुछ आंसू घुटते मरते
मेरे जिस्म के एक सिरे से दूजे सिरे तक दौड़े भागे
तन पिंजड़ा मन कैदी उड़ने को मेरा जी चाहे
इस दर्द ने मुझको बहका ही लिया
मुझमें ही मुझको क़ैद किया
कौन हूँ मैं  क्या नाम है मेरा
इस टीस  ने ये भी भुला दिया
आईना  भी मेरा मुझे पहचानता  नहीं
ए मेरे खुदा  मुझे तू मुझसे मिला
तन पिंजड़ा मन कैदी उड़ने को मेरा जी चाहे
मन किस दोराहे पे है खड़ा हुआ
एक छटपटाहट से है ये भरा हुआ
मेरे बंधन सारे खोल दे
सौदा है ये भी गर  तुझसे
मेरी मुस्कानें तू मोल ले
कैदी मन को मेरे तू अपनी नेमतों से तोल  दे
तन पिंजड़ा मन कैदी उड़ने को मेरा जी चाहे
उड़ने को मेरा जी चाहे

----------------------------------पारुल'पंखुरी'


चित्र-- साभार गूगल (www.mymodernmet.com)

Monday, 29 September 2014

किरचें













साल दर साल 


गुजरते रहे 

परत दर परत 

चढ़ती गयी 

मुस्कान |

खरीदती रही 

भावनाओं का 

सौदा करके,
 
खुशियां 

ढूंढती रही 

अरमानों को 

सिल के |

आँखों ने 

एक नया 

सपना 

देखने की 

जुर्रत कर दी 

तभी 

आंसू 

की जगह 

खून बह निकला 

टूटे सपनों की 

किरचें 

अब तक धंसी 

जो हैं आँखों में

---------------पारुल'पंखुरी'

चित्र -- साभार गूगल 

Thursday, 12 June 2014

मै चुप रहा







रक्त रिसता रहा
आग जलती रही
कभी राम
कभी रहीम
बलि चढ़ती रही
सियासी चालों की भेंट
मै चढ़ता गया
फिर भी मै चुप रहा

लूट डकैती
गोली सरेआम
लाल हुई सुबह
हुई शाम लाल
दिन डरावने
रातें भयंकर
नौनिहालों पर कहर
बरसा निरंतर
खून के आँसू
मै पीता गया
फिर भी मै चुप रहा

काँधें मेरे
अब
झुकने लगे
पेड़ो पर जब
शव लटकने लगे
माता बहन
या हों बच्चियां
अभी बहुत
बाकी हैं रस्सियाँ

हाय!
पीड़ा से ह्रदय
मेरा छलनी हुआ
क्यूँ अब तक
मै यूँ चुप रहा
फटता ज्वालामुखी
नवनिर्माण होता
इस तरह मै ना
यूँ लहुलुहान होता
क्या हूँ आज
मात्र
लोथड़ों का
अवशेष हूँ
मै
उत्तर प्रदेश हूँ

------------पारुल'पंखुरी'
चित्र -- साभार गूगल
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