एक आग धधकती सीने में
क्या इसका मै उपचार करूँ
दर्द की हवाओ से सुलगाऊं
यू ही खुद पे अत्याचार करूँ
या करूँ अब इसका आमना सामना
तन मन में हिम्मत उपजाऊं
शोले छूने से डर जाऊं
या इस आग से अब साक्षात्कार करूँ
इस आग को अपनी शक्ति बना लूँ
इसकी लपटों से जल जाऊ
जलने दू इसको सीने में
या नयन बूँद से इसका संहार करूँ
खो जाऊं अंधेरो की गहराई में
जीवन में पल पल डरती जाऊं
या इस आग से भर लू रोम रोम को
प्रहलाद बनने को मन तैयार करूँ
-----पारुल'पंखुरी'
चित्र-- साभार गूगल (



