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Saturday, 29 November 2014

तनहा रात



ना लिखने को कोई बात है,


ना उभरे कोई जज्बात हैं,

बस मै हूँ ..सिर्फ मै

और ये तनहा रात है


ना तारें हैं टिमटिमाने को 

ना चाँद है गुनगुनाने को 

बस स्याह अकेली रात है 

मन मेरा बहलाने को 

ना होठों पर है हंसी

ना आंसुओ की सौगात है 

बस मै हूँ ..सिर्फ मै 

और ये तनहा रात है 


ना स्याही है कलम में,

आक्रोश के शब्द बहाने को

ज़ज्ब कर गया कोरा कागज़ ,

दिल के सारे फसानो को

ना ख़ुशी से कोई उमंग ,

ना गमो का एहसास है ..

बस मै हूँ ..सिर्फ मै

और ये तनहा रात है 


                                                                                      -----पारुल'पंखुरी'
                                                                                picture courtesy : google 

3 comments:

  1. चाँद नहीं सूरज नहीं आसमां में तारा भी नहीं
    मेरी तन्हा रातों का अब कोई सहारा भी नहीं।
    एक तुम आओ तो कोई बात बने मेरे हमदम
    तुम्हारे सिवा मुझे कोई और गंवारा भी नहीं॥
    :) :) :)

    ReplyDelete
  2. तंह रात और मैं ... बहुत कल्पनाओं को जन्म दे देता है ... और निकल आते हैं शब्द ...
    जैसे ये रचना ...

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छी कविता .........

    ReplyDelete

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