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Thursday, 18 October 2012

प्रेम..में..बावरी..

















क्यू मौसम आज महकने लगा

क्यू उमंगो पे सवार होके मन ये चला

क्यू दबे होठो पे धीमी हँसी आ गई

क्यू तन मन मेरा गुलमोहर हुआ

क्यू उम्मीदों के नए पंख लगने लगे

क्यू नैना ये सपने सजाने लगे

क्यू पलकें मेरी झुक के न उठीं

क्यू पर्दों में कई रंग छाने लगे

सांवला रंग मोहे ऐसा भाया सखी

खोई सुध-बुध हुई मै भी साँवरी

प्रीत के रंग से मै तो ऐसी रंगी

जैसे गोपी कोई कृष्ण प्रेम में बावरी

प्रेम में बावरी.

------------पारुल 'पंखुरी'







2 comments:

  1. उसी का प्रेम शास्वत भी है , बाकी सारे प्रेम नश्वर |
    प्रेम की पराकाष्ठा है वो |

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